Sunday, 3 March 2019

अभिनंदन की वापसी

अभिनंदन की वापसी की प्रार्थना मैंने भी की... और अभिनंदन के लौटने की खुशी मुझे भी हुई... लेकिन अभिनंदन को लेकर जैसी अतिशयता भरी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है वह हम लोगों का ट्रेडमार्क है। भारतीय जनता अतिशयता के दो किनारों पर जीती है -- अतिशय नफ़रत या अतिशय प्यार।

अभिनंदन वापस आ गए हैं -- उनके लिए तमाम तरह से ख़ुशी का इज़हार भी हो चुका है -- लेकिन इस शोरगुल के बीच स्काड्रन लीडर सिद्धार्थ वशिष्ठ के लिए बहुत कम लोगों ने शोक जताया। जो बचकर आ गया उसके लिए पेंटिंग बन रही हैं, कविताएँ लिखी जा रही हैं, ट्वीट्स हो रहे हैं, टनों स्याही से खबरें छप रही हैं, करोड़ों मैन-हॉवर टीवी निहारने में खर्च हो रहे हैं... लेकिन जो शहीद हो गया उसके लिए तो...

भावनात्मक अतिशयता की यही लहरें हमसे हमारा विवेक छीन लेती हैं... मीडिया हमें जो सेलेब्रेट करने को कहता है हम उसे सेलेब्रेट करते हैं... मीडिया जिससे नफ़रत करने को कहता है हम उससे नफ़रत करने लगते हैं। हमें लगता है कि हम अपने मन से कुछ कर रहे हैं लेकिन यदि आप ठंडे दिमाग़ से सोचें तो हमारे सारे विचार और कार्य मीडिया नियंत्रित हैं (इसमें सोशल मीडिया भी शामिल है)... हम पढ़-सुन कर भावना की लहरों में हिल्लोर खाते रहते हैं और समझते रहते हैं कि नाव पर हमारा ही नियंत्रण है।

सिद्धार्थ वशिष्ठ और पुलवामा के बाद शहीद हुए अन्य सिपाहियों की आत्माएँ भी स्वर्ग से अभिनंदन का अभिषेक और स्वयं को लगभग भुला दिए जाने का तमाशा देख रही होंगी।

जवाब हमें ही देना होगा कि कुछ दिन पहले तक शहादत की महानता का राग अलापने वाले करोड़ों "देशभक्त" लोग कैसे अचानक आई एक लहर में शहादत और शहीदों को भूल जाते हैं।

जवाब हमें ही देना होगा कि कैसे पुलवामा में शहीद हुए जवान की पत्नी को खुलेआम कुलक्षिणी, देशद्रोही और अपने पति की हत्यारी कहा गया क्योंकि उन्होनें "I don't want war" शब्द कह दिए थे।

जवाब हमें ही देना होगा कि कैसे हमारा समाज पुलवामा में शहीद हुए एक अन्य जवान की पत्नी को मात्र आठ दिन के बाद अपने देवर से ब्याह करने के लिए मजबूर कर रहा है।

मेरे देशवासियों... अतिशयता से बचें... कृपया अतिशयता से बचें... यह एक रोग है जो आपकी नसों में मीडिया द्वारा उतारा जा रहा है... कृपया अतिशयता से बचें

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