Friday, 15 March 2019

प्राचीन भारत में संवैधानिक शासन प्रणाली

लोकतंत्र , प्रतीनिधी - संस्थान , शासकों की स्वेच्छाधारी शक्तियों पर अंकुश और विधि के शासन की संकल्पनाएँ प्राचीन भारत के लिए पराई नहीं थी। धर्म की सर्वोच्चता  की संकल्पना विधि के शासन या नियंत्रित सरकार की संकल्पना से भिन्न नहीं थी।  प्राचीन भारत में शासक धर्म से बंधे हुए थे ; कोई भी व्यक्ति धर्म का उल्ल्घन नहीं कर सकता था। ऐसे पर्याप्त प्रमाण सामने आये हैं , जिनसे पता चलता है कि प्राचीन भारत के अनेक भागों में गणतंत्र शासन - प्रणाली , प्रतीनिधी - विचारण मंडल और स्थानीय स्वशाषि संस्थाएं विध्यमान थी और वैदिक काल से ही लोकतांत्रिक चिंतन तथा व्यवहार लोगों के जीवन के विभिन्न पहलुओं में घर कर गए थे।
ऋगवेद तथा अथर्ववेद में सभा तथा समिति का उल्लेख मिलता है।  ऐतरेय ब्राह्मण ,पाणिनि की अष्टाधायी , कौटिल्य का अर्थशास्त्र , महाभारत , अशोक स्तम्भों पर उत्कीर्ण शिलालेख , उस काल के बौद्ध तथा जैन ग्रन्थ और मनुस्मृति - ये सभी इस बात के साक्ष्य है कि भारतीय इतिहास के वैदिकोत्तर काल में अनेक सक्रिय गणतंत्र विध्यमान थे।  विशेष रूप से महाभारत के बाद , विशाल साम्रज्यों के स्थान पर अनेक छोटे - छोटे गणतंत्र - राज्य अस्तित्व में आ गए। जातकों में इस प्रकार के अनेक उल्लेख मिलते है कि गणतंत्र किस तरह कार्य करते थे।
सदसयगण 'संथागार' में समवेत होते थे।  प्रतिनिधियों का चुनाव खुली सभा में किया जाता था।  वे अपने 'गोप' का चयन करते थे।  वह राजा बनता था तथा मंत्रिपरिषद की सहायता से शासन करता था।

ई.पू. चौथी शताब्दी में 'क्षुद्रक मल्ल संघ ' नामक गणतंत्र - परिसंघ ने सिकंदर का मुकाबला किया था।  पाटलिपुत्र के निकट लिच्वियां की राजधानी वैशाली थी।  वह राज्य एक गणतंत्र था।  उसका शासन एक सभा चलाती थी। उसका एक निर्वाचित अध्यक्ष होता था ,और उसे नायक कहा जाता था।  दुर्भाग्यवश , हमारे पास इन गणतंत्र के संविधान के विवरण के विषय में कोई अधिक जानकारी नहीं  है। यूनानी विद्वान् मैगेस्थनीज़ ने ऐसी जननिर्वाचित सभाओं के अभिलेख छोड़ें है जिन्हें दक्षिण में जीवित रखा गया था तथा जिन्होंने राजाओं की शक्तियों पर अंकुश लगाया हुआ था।  कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि प्राचीन भारतीय राज्य व्यवस्था में स्वेच्छाधारी शासन या राजाओं के देवी अधिकारों के लिए कोई स्थान नहीं था।  भारतीय राजा की शक्ति पर ऐसे प्रतिबंध लगा दिए गए थे जिससे कि वह उसका दुरूपयोग न कर सके। उसकी शक्ति को अन्य लोक  प्राधिकारियों तथा हितों के अधिकारों एवं शक्तियों द्वारा नियंत्रित कर दिया गया था।
वस्तुतया वह एक सिमित या संवैधानिक राजा था और जनता के बहुमत के आधार पर कार्य करता था।  मनु लिखते है कि जिस प्रकार पागल कुत्ते को मार दिया जाता है , उसी प्रकार अन्यायी तथा अत्याचारी राजा को उसकी अपनी प्रजा द्वारा मार दिया जाना चाहिए। 

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